आइन्स्टाइन के जन्मदिवस पर आसन्न ख़तरे का इंगित

अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने जब ऊर्जा का सिद्धांत जिससे परमाणु बम बन सकता था, कि खोज की तो वह बेहद खुश थे। लेकिन वह अचानक निराशा,दुख और अवसाद में डूब गए जब अपने घर पर आए।

वाक़या कुछ ऐसा है कि उनके चेहरे के ख़ुशी के भाव देखकर उनके बेटे ने इसका कारण पूछ लिया तो उन्होंने बताया कि इस फ़ॉर्मूले से ऐसे हथियार बनाए जा सकते हैं जिनसे पल भर में कुछ भी ख़ाक हो सकता है,किसी को भी मारा जा सकता है।

बाल जिज्ञासा वश जब उनके बेटे ने प्रश्न किया कि क्या मुझे भी मार सकता है आपका यह बम? तब उनके विचार की दिशा का आयाम बदल गया और वह बहुत दुख और पछतावे में डूब गए थे कि यह कौन सा अविष्कार कर दिया उन्होंने,और फिर हमेशा प्रयत्नशील रहे कि यह पावर राजनीतिज्ञों के हाथ न आ पाए।

उनकी आशंका ने आकार लिया और जापान के दो शहर आज भी दंश झेलने के लिए अभिशप्त हैं इसका।

जब भी कोई पावर ग़लत हाथ में जाती है तो उसके हमेशा दुरुपयोग ही देखने को मिलते हैं।

आज विज्ञान न जाने कितने तरह के प्रयोग कर रहा है जिनके भविष्य में ऐसे ही ख़तरे देखने को मिलेंगे।

फसल का अधिक उत्पादन,उनमें कीट नियंत्रण की क्षमता के लिए उनके मूल स्वभाव के साथ जीन में परिवर्तन कर छेड़छाड़ की जा रही है और इनके पेटेंट करवाकर बाज़ार में उतारे जा रहे हैं।

और बाज़ार अधिकतम कमाने के लालच में एकाधिकार का आकांक्षी है,सियासत और बाज़ार के गठजोड़ से यह सब हो रहा है।

बीटी वैगन,बीटी कॉटन जैसे बीज हमारे बाज़ार में भी आ चुके हैं,टमाटर में मछली के जीन डाले जा रहे हैं । इन बीजों से उनके जीन में इस तरह के परिवर्तन किए जा रहे हैं कि वह बीज सिर्फ़ एक बार ही फसल देगा और अगली बार नये बीज ख़रीदने पड़ेंगे।

सो मनुष्य में भी इसके परिवर्तन और दुष्प्रभाव परिलक्षित होना अवश्यंभावी है।

ख़तरा आपके स्वास्थ्य पर भी है और स्वावलंबन पर भी।

कोई भी बड़ी बात नहीं होगी यदि भविष्य में मनुष्य रुप में यह देह पूरी तरह से मशीन में बदल जाए।

सो किसान भाइयों को इस आसन्न ख़तरे के विषय में सोचकर अपने

बीज बचाने की जुगत में जुट जाना चाहिए, अन्यथा आपका भविष्य बीज कम्पनियों की ग़ुलामी के अंधेरे में गुज़रने को मजबूर हो जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

@पं० राजू शर्मा नौटा

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