लम्बे समय तक भारत के बच्चों में कुपोषण की बड़ी चिंता थी पर आज की चिंता इसके विपरीत है। शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक बच्चों की थाली में घर का बना ताजा खाना कम और फास्ट फूड ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। चिप्स, नमकीन, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रोजन स्नैक्स, बर्गर, पिज्जा और रंग बिरंगे पैकेज्ड पेय बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। स्वाद और उपलब्धता ने एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है।
आज भारत में टाइप 2 डायबिटीज, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और फैटी लीवर जैसी बीमारियां केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रह गई हैं। देश के बड़े अस्पतालों में डॉक्टर लगातार ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ने की बात कह रहे हैं, जिनका वजन सामान्य से अधिक है, जिनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस विकसित हो रही है या जिनके शरीर में वसा असामान्य रूप से जमा हो रही है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे बदलती जीवनशैली और भोजन की बदलती आदतें बड़ी वजह हैं।
पैकेज्ड और अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ लंबे समय तक खराब न हों, उनका स्वाद हर बार एक जैसा रहे और वे देखने में आकर्षक लगें, इसके लिए उनमें कई प्रकार के फ्लेवर, रंग, इमल्सीफायर और स्टेबलाइजर मिलाए जाते हैं।
इन खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक और वसा की मात्रा बहुत अधिक होती है, जबकि फाइबर, विटामिन और प्राकृतिक पोषक तत्व न के बराबर होते हैं। बच्चे जब ऐसे उत्पादों का अत्यधिक और नियमित सेवन करने लगते हैं। तो उनके अन्दर अनेकों बीमारियां घर करने लगती है।
पहले भारत में जहां सुबह का नाश्ता पराठा, पोहा, उपमा, दलिया, इडली, चिला या मौसमी फल होते थे, वहीं अब उनकी जगह मीठे सीरियल, फ्लेवर्ड दूध, पैकेज्ड जूस और तैयार स्नैक्स ने ले ली है। स्कूल से लौटते समय बच्चे अक्सर चिप्स, बिस्कुट, बर्गर, पिज्जा, मोमोज या नूडल्स खाते हैं। शाम को मोबाइल और टेलीविजन देखते हुए कोल्ड ड्रिंक के साथ स्नैक्स खाना सामान्य बात बन गई है।
बच्चा जब लगातार अत्यधिक मीठा, नमकीन या तेल युक्त भोजन खाता है तो उसे घर का सामान्य खाना फीका लगने लगता है। उसकी पसंद को बदलने लगती है नतीजतन फल, सब्जियां, दाल, दूध और खाना से दूरी बनाने लगता है। जिससे शरीर को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर पैकेज्ड फूड या फास्ट फूड कभी नहीं खाना चाहिए। समस्या कभी-कभी खाने में नहीं है समस्या तब पैदा होती है जब हम मिलावटी सामग्री, अत्यधिक नमक और चीनी वाले भोजन को रोज के भोजन का हिस्सा बना लेते है और इस चक्कर में संतुलित भोजन पीछे छूट जाता है।
बच्चों को बचपन से ही सही खानपान की आदत सिखाना उतना ही जरूरी है, जितना उन्हें पढ़ाना या अच्छे संस्कार देना। माता-पिता को चाहिए कि बच्चों के भोजन में ताजे फल, हरी सब्जियां, दालें, साबुत अनाज, दूध, दही, मेवे और घर का बना भोजन प्रमुख हो। फास्ट फूड केवल कभी-कभी सीमित मात्रा में घर पर बना कर दें। पैकेज्ड स्नैक्स खरीदते समय उनके पैकेट पर लिखी जानकारी पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। यदि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा बहुत अधिक है तो उसका सेवन बच्चों को ना करने दें जिससे वह भी भविष्य में इसके प्रति जागरूक होगे।
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। यदि हमारी नई पीढ़ी बचपन से ही गलत भोजन की आदी हो गई तो आने वाले वर्षों में अनेकों बीमारियों का बोझ बढ़ सकता है। विद्यालयों को भोजन के बारे में बच्चों को इनकी जानकारी देनी चाहिए और सरकार को ऐसे प्रोडक्ट की बिक्री पर रोक लगनी चाहिए जो नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए सही ना हो।
अनमोल दुबे
आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम…