भारत आजाद हो चुका था। आजादी के साथ आया भारत- पाकिस्तान का बटवारा। इसी बटवारे के साथ एक सवाल आता है की आखिर भारत और पाकिस्तान की सीमा कहां से गुजरेगी? कौन सा शहर भारत में रहेगा और कौन-सा पाकिस्तान में जाएगा। कौन-सा गांव किस देश का हिस्सा बनेगा। पंजाब और बंगाल जैसे बड़े प्रांतों को आखिर किस आधार पर बांटा जाएगा?

उस समय सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोग किसी साफ खांचे में बंटे हुए नहीं थे। एक ही जिले में हिंदू, मुस्लिम और सिख आबादी साथ रहती थी। कहीं एक गांव में मुस्लिम बहुमत था तो कुछ किलोमीटर दूर हिंदू या सिख बहुमत वाला इलाका शुरू हो जाता था। ऊपर से नदियां, नहरें, रेलवे लाइनें और सड़कें थीं, जो धर्म देखकर नहीं चलती थीं।

इसी उलझन को सुलझाने की जिम्मेदारी एक ऐसे ब्रिटिश वकील को दी गई, जिसने इससे पहले भारत देखा तक नहीं था। उसका नाम था सर सिरिल जॉन रैडक्लिफ।

सिरिल रैडक्लिफ ब्रिटेन के जाने माने वकील थे। वे संवैधानिक और कानूनी मामलों के विशेषज्ञ थे। लेकिन भारत के भूगोल, समाज और यहां की जमीनी परिस्थितियों से उनका कोई प्रत्यक्ष परिचय नहीं था।

India Pakistan partition in 1947

फिर भी जुलाई 1947 में उन्हें भारत बुलाया गया और पंजाब तथा बंगाल की सीमा तय करने की जिम्मेदारी दे दी गई। वक्त बहुत कम था।

भारत के विभाजन की योजना तैयार हो चुकी थी। अब जमीन पर नई सीमा खींचनी थी। इसके लिए पंजाब और बंगाल में अलग-अलग सीमा आयोग बनाए गए। दोनों आयोगों की अध्यक्षता रैडक्लिफ को दी गई

दोनों आयोगों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि शामिल थे। लेकिन दोनों पक्षों के प्रतिनिधि आपस में सहमत नहीं हो पा रहे थे। आखिर में फैसला रैडक्लिफ को ही करना था।

उनके पास लगभग पांच सप्ताह का समय था। एक ऐसे व्यक्ति को, जो भारत में नया था, कुछ ही हफ्तों में पंजाब और बंगाल जैसे विशाल और जटिल इलाकों को दो देशों के बीच बांटना था।

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल था कि सीमा तय करने का आधार क्या होगा? ब्रिटिश सरकार के निर्देशों में कहा गया था कि मुस्लिम और गैर मुस्लिम आबादी वाले बहुल क्षेत्रों को मुख्य आधार माना जाए। लेकिन इसके साथ अन्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना था।

रैडक्लिफ के सामने कोई ऐसा नक्शा नहीं था जिसमें हिंदू इलाका अलग रंग में और मुस्लिम इलाका अलग रंग में दिखाई देता हो। उन्हें अलग-अलग आंकड़ों और दावों को देखकर एक ऐसी सीमा बनानी थी, जो दोनों पक्षों की राजनीतिक मांगों के बीच कहीं संतुलन बना सके।

जुलाई, 1947 में सीमा आयोगों की कार्यवाही शुरू हुई। बंगाल सीमा आयोग की सार्वजनिक सुनवाई 16 से 24 जुलाई तक कलकत्ता में हुई। अलग-अलग पक्षों ने अपने दावे और तर्क आयोग के सामने रखे। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और दूसरे संगठनों ने अपने अपने पक्ष में दस्तावेज और ज्ञापन दिए।

पंजाब में सार्वजनिक सुनवाई 21 से 31 जुलाई तक लाहौर में हुई। यहां भी कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधियों ने अपने दावे पेश किए।

हर पक्ष चाहता था कि ज्यादा से ज्यादा इलाका उसके हिस्से में आए। किसी के लिए आबादी सबसे बड़ा आधार थी। कोई नहर और सिंचाई व्यवस्था की बात कर रहा था। कोई रेलवे लाइन और व्यापारिक रास्तों का हवाला दे रहा था। कुछ इलाकों में धार्मिक स्थलों का सवाल था तो कहीं प्रशासनिक व्यवस्था का।

पंजाब में स्थिति खास तौर पर कठिन थी। यहां हिंदू, मुस्लिम और सिख आबादी कई इलाकों में एक दूसरे के साथ रहती थी। पंजाब की अर्थव्यवस्था भी नहरों और सिंचाई व्यवस्था पर बहुत निर्भर थी।

एक नहर का पानी कई जिलों तक पहुंचता था। एक रेलवे लाइन कई इलाकों को जोड़ती थी। बिजली की परियोजनाएं भी ऐसे क्षेत्रों को बिजली देती थीं जो बाद में अलग-अलग देशों में चले गए।

ऐसे में सीमा खींचना सिर्फ जमीन बांटना नहीं था। यह तय करना था कि पानी किस देश के हिस्से में जाएगा। रेलवे किस देश में रहेगी। बिजली किसे मिलेगी। कौन सा शहर किस प्रशासन के अधीन होगा।

बंगाल की स्थिति भी आसान नहीं थी। यहां भी धार्मिक आबादी, प्रशासनिक सीमाएं और आर्थिक व्यवस्था एक दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाती थीं।

किसी इलाके में मुस्लिम आबादी ज्यादा थी, लेकिन उसका व्यापारिक संपर्क दूसरे इलाके से था। कहीं रेलवे लाइन का रास्ता ऐसा था कि सीमा खींचने पर वह दो हिस्सों में बंट जाती।

रैडक्लिफ को कोशिश करनी थी कि रेलवे और नदी व्यवस्था को कम से कम नुकसान हो। लेकिन हर जगह ऐसा करना संभव नहीं था।

रैडक्लिफ ने अगस्त 1947 में पंजाब और बंगाल के लिए अपने अंतिम फैसले तैयार किए। लेकिन एक अजीब स्थिति पैदा हुई। भारत 15 अगस्त को आजाद हो गया। पाकिस्तान भी स्वतंत्र हो चुका था। लोग आजादी का जश्न मना रहे थे। लेकिन आम लोगों को अभी यह पूरी तरह मालूम नहीं था कि उनकी जमीन आखिर किस देश में गई है।

रैडक्लिफ पुरस्कार 17 अगस्त, 1947 को सार्वजनिक किया गया। यानी आजादी के दो दिन बाद लोगों को पता चला कि उनके गांव, खेत, बाजार और शहर किस देश का हिस्सा बन गए हैं।

रैडक्लिफ रेखा केवल नक्शे पर खींची गई सीमा नहीं थी। इसके साथ लाखों लोगों की जिंदगी बदल गई। जो परिवार पीढ़ियों से एक जगह रह रहे थे, उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। खेत छूट गए। दुकानें छूट गईं। रिश्तेदार दूसरी तरफ चले गए। धार्मिक स्थल सीमा के दूसरी ओर रह गए। पंजाब में बड़े पैमाने पर आबादी का पलायन हुआ। बंगाल में भी लोगों ने अपना घर छोड़ा और सीमा पार की।

इस दौरान भयानक हिंसा हुई। ट्रेनें लोगों से भरकर एक तरफ से दूसरी तरफ जा रही थीं। सड़कों पर काफिले निकल रहे थे। लोग अपने साथ उतना ही सामान ले जा पा रहे थे जितना उठा सकते थे। विभाजन के दौरान कितने लोग मारे गए, इसे लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग अनुमान हैं। लेकिन यह निर्विवाद है कि यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय विस्थापनों में से एक था।

1947 में खींची गई रैडक्लिफ रेखा ने दक्षिण एशिया का नक्शा बदल दिया। पंजाब दो देशों में बंट गया। बंगाल भी दो हिस्सों में चला गया। आगे चलकर पूर्वी पाकिस्तान 1971 में बांग्लादेश बना, लेकिन 1947 में खींची गई सीमा का बड़ा हिस्सा आज भी भारत और बांग्लादेश की सीमा का आधार है।

रैडक्लिफ ने अपना काम पूरा किया और भारत छोड़ दिया। लेकिन जिस रेखा को उन्होंने कुछ ही हफ्तों में तय किया था, उसका असर करोड़ों लोगों की जिंदगी पर पड़ा।

इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिन्हें लेने में बहुत कम समय लगता है, लेकिन उनके परिणाम पीढ़ियों तक चलते हैं।

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By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

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