दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में कैंसर से पीडित हर 8 में से एक बच्चा भारतीय है। रिपोर्ट में ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी के आंकडों के आधार पर बताया गया है कि दुनिया में बच्चों में कैंसर के कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी करीब 8.8 प्रतिशत है। दक्षिण एशिया की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां कैंसर से पीडित बच्चों में लगभग 68 प्रतिशत बच्चे भारत से हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर वर्ष दुनिया में करीब 4 लाख बच्चों और किशोरों में कैंसर का पता चलता है। बच्चों में ल्यूकेमिया, ब्रेन ट्यूमर, लिम्फोमा और हड्डियों से जुडे कैंसर प्रमुख रूपों में शामिल हैं।

बच्चों में होने वाले कैंसर के अधिकांश मामलों का कोई एक निश्चित कारण बताना संभव नहीं है। आनुवंशिक कारणों की भूमिका भी होती है। लेकिन बदलता पर्यावरण, खानपान और जीवनशैली भी स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी के अनुसार, भोजन, पानी, हवा और मिट्टी में मौजूद कुछ हानिकारक तत्वों के लंबे समय तक संपर्क में आने से कैंसर का जोखिम बढ सकता है।

आज हमारी थाली भी पहले जैसी नहीं रही। ताजे और प्राकृतिक भोजन की जगह पैकेट वाले खाद्य पदार्थ, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी, नमक और वसा वाले खाद्य पदार्थ तेजी से बढ रहे हैं। बच्चों में भी फास्ट फूड और मीठे पेय का चलन बढा है। हालांकि बच्चों के कैंसर को केवल खानपान से जोडना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन जीवनशैली और आहार कैंसर के जोखिम को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।

दुनिया भर में चल रहे अध्ययनो से सामने आया है की खेतों में उपयोग होने वाले कुछ रसायनों से भी कैंसर के लक्षण सामने आते हैं। विशेष रूप से गर्भावस्था से पहले या गर्भावस्था के दौरान माता पिता के कुछ व्यावसायिक कीटनाशक संपर्क और बच्चों में ल्यूकेमिया के जोखिम के बीच संबंध के संकेत मिले हैं।

कई बार हमें लगता है की बच्चों में लगातार बुखार, कमजोरी, वजन कम होना, शरीर पर असामान्य गांठ, हड्डियों में दर्द, बार-बार संक्रमण सामान्य बीमारी है। इससे सही जांच में देरी होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक जांच सुविधाओं की कमी इस समस्या को और बढा देती है।

कैंसर के उपचार में देरी का असर बच्चों पर बहुत गंभीर हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विकसित देशों में बच्चों के कैंसर के 80 प्रतिशत से अधिक मरीज ठीक हो जाते हैं, जबकि कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों में यह दर 30 प्रतिशत से भी कम है। इसका प्रमुख कारण देर से बीमारी का पता चलना, सही जांच न होना, उपचार की सुविधाओं तक सीमित पहुंच और कई बार उपचार बीच में छोड देना है।

इस स्थिति को बदलने के लिए सबसे पहला कदम जागरूकता है। माता पिता को बच्चों में दिखाई देने वाले असामान्य और लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर भी जागरूकता बढानी होगी। जिला स्तर पर जांच और रेफरल व्यवस्था मजबूत करनी होगी, ताकि बच्चे को समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक तक पहुंचाया जा सके।

कैंसर के खिलाफ असली लडाई अस्पताल में पहुंचने से पहले शुरू होती है। स्वस्थ भोजन, स्वच्छ पर्यावरण, सक्रिय जीवनशैली, सुरक्षित खेती और समय पर जांच को जीवन का हिस्सा बनाकर हम आने वाली पीढी को इस बीमारी के बढते खतरे से काफी हद तक बचाने की दिशा में आगे बढ सकते हैं।

इसके साथ ही कैंसर उपचार को महानगरों तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाना जरूरी है। आवश्यक दवाओं, जांच सुविधाओं और प्रशिक्षित बाल कैंसर विशेषज्ञों की उपलब्धता बढानी होगी।

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By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

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