आज के दौर में बच्चों का बचपन तेजी से बदल रहा है। पहले बच्चे घर से बाहर निकलते ही मैदान खोजते थे। पेड़ पर चढना, मिट्टी में खेलना, साइकिल चलाना और घंटों दोस्तों के साथ खेलना सामान्य। आज इनकी जगह मोबाइल फोन, टैबलेट, वीडियो गेम और ऑनलाइन वीडियो ने ले ली है। आज बच्चों के हाथ में हमेशा मोबाइल रहता है। खाना खाते समय, घुमने के दौरान, सोने से पहले। धीरे-धीरे यही स्क्रीन मनोरंजन की जगह बच्चे की दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है।

हाल में ही एक खबर सामने आई है, दुनिया की तकनीकी कंपनियों से जुडे कुछ बडे नाम जो लोग पूरी दुनिया को नई तकनीक दे रहे हैं। वे अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर काफी सजग हैं। वे बच्चों को केवल डिजिटल दुनिया में व्यस्त रखने के बजाय उन्हें वास्तविक दुनिया से जोडने पर जोर देते हैं। बच्चों को मिट्टी में खेलने देना, किताबें पढना, परिवार के साथ समय बिताना और बाहर की दुनिया को समझने का अवसर देना उनके पालन पोषण का हिस्सा है। यह बात सोचने पर मजबूर करती है कि जब तकनीक के सबसे करीब रहने वाले लोग अपने बच्चों के लिए स्क्रीन की सीमा तय कर रहे हैं तो हमें भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

तकनीक आज हमारे जीवन की जरूरत बन चुकी है। पढाई से लेकर जानकारी हासिल करने और दुनिया से जुडने तक इसके अनेक लाभ हैं। समस्या तब शुरू होती है जब तकनीक हमारे जीवन को नियंत्रित करने लगे। छोटे बच्चे जब लगातार स्क्रीन देखते हैं तो उनका समय सीमित नहीं मोबाइल उन्हें तुरंत मनोरंजन देता है। इसके मुकाबले किताब पढना या किसी पौधे की देखभाल करना धैर्य मांगता है। इसलिए बच्चा आसान मनोरंजन की ओर आकर्षित होता है।

बचपन केवल पढाई और परीक्षा की तैयारी का समय नहीं है। यह वह समय है जब बच्चे अपने आसपास की दुनिया को समझते हैं। वे चीजों को छूकर सीखते हैं। सवाल पूछकर सीखते हैं। गिरकर उठना सीखते हैं। दोस्तों के साथ खेलते हुए सहयोग और नेतृत्व सीखते हैं। मैदान में हारने पर धैर्य रखना और जीतने पर विनम्र रहना सीखते हैं। मिट्टी में खेलते हुए बच्चे प्रकृति के करीब आते हैं। पेड़ के पत्ते, फूल, चींटियां, पक्षी और बदलता मौसम उनके लिए किसी किताब से कम ज्ञान का स्रोत नहीं होते। प्रकृति बच्चे की जिज्ञासा को जगाती है और उसकी कल्पना को विस्तार देती है।

आज बच्चों की सबसे बडी आवश्यकता नई तकनीक नहीं है उन्हें आवश्यकता है कि वे तकनीक के साथ संतुलन बनाना सीखें। मोबाइल को पूरी तरह बच्चों से दूर करना हर परिवार के लिए संभव भी नहीं है और जरूरी भी नहीं। लेकिन यह तय करना जरूरी है कि मोबाइल बच्चे के जीवन का कितना हिस्सा होगा। क्या वह पढाई के लिए उसका उपयोग कर रहा है या केवल मनोरंजन के लिए। क्या वह कुछ समय स्क्रीन देखने के बाद बाहर खेलता भी है। क्या उसके पास किताब पढने का समय है। क्या वह परिवार के साथ बैठकर बातचीत करता है। ये छोटे सवाल बच्चों के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि हर स्क्रीन टाइम खराब नहीं होता। आज डिजिटल शिक्षा बच्चों के लिए उपयोगी साधन बन चुकी है। अच्छी शैक्षणिक सामग्री उनके ज्ञान को बढा सकती है। समस्या स्क्रीन के उपयोग में नहीं बल्कि उसके असंतुलित उपयोग में है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि तकनीक एक साधन है, जीवन का विकल्प नहीं। मोबाइल जानकारी दे सकता है लेकिन दोस्ती का अनुभव नहीं दे सकता। वीडियो प्रकृति दिखा सकता है लेकिन मिट्टी की खुशबू महसूस नहीं करा सकता। ऑनलाइन खेल मनोरंजन दे सकता है लेकिन मैदान में साथियों के साथ खेलने का आनंद अलग होता है।

बच्चों को तकनीक से दूर करने की बजाय हमें उन्हें वास्तविक दुनिया के और करीब लाने की जरूरत है। उनके लिए ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां मोबाइल से बाहर भी उन्हें आनंद मिले। घर में किताबें हों। खेलने की जगह हो। पौधे हों। परिवार के साथ बातचीत हो। छुट्टी के दिन बाहर जाने की योजना हो। बच्चों को छोटे-छोटे घरेलू कामों में शामिल किया जाए। उन्हें चीजें बनाने, बिगाडने और फिर से बनाने की स्वतंत्रता दी जाए। जब बच्चे को वास्तविक दुनिया में पर्याप्त आनंद और अनुभव मिलेगा तो वह हर खाली समय मोबाइल में बिताने की ओर कम आकर्षित होगा।

बच्चे का बचपन किसी स्क्रीन पर नहीं बनता। वह उन अनुभवों से बनता है जिन्हें बच्चा अपने हाथों से छूता है, अपनी आंखों से देखता है और अपने मन से महसूस करता है। इसलिए बच्चों को केवल तेज इंटरनेट और नई तकनीक देने की जरूरत नहीं है। उन्हें मिट्टी में खेलने का अवसर भी चाहिए। फूल पत्तियों को देखने का समय भी चाहिए। मैदान में दौडने की आजादी भी चाहिए और परिवार के साथ बैठकर बातें करने का अवसर भी।

आज की सबसे बडी चुनौती बच्चों को तकनीक से बचाना नहीं बल्कि उन्हें तकनीक और जीवन के बीच संतुलन सिखाना है। आने वाला समय तकनीक का ही होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा और नई तकनीक बच्चों के जीवन का हिस्सा बनेंगी। ऐसे में उन्हें तकनीक से काटना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि उनके हाथ में मोबाइल के साथ किताब भी हो, स्क्रीन के साथ मैदान भी हो और डिजिटल दुनिया के साथ प्रकृति की दुनिया भी हो। तकनीक हमारे बच्चों का भविष्य बदल सकती है, लेकिन उनका बचपन हमें ही बचाना होगा। यही कारण है कि तकनीक की दुनिया के बडे लोग भी अपने बच्चों को स्क्रीन से बाहर की दुनिया दिखाने पर जोर दे रहे हैं।

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By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

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