समुद्र की सतह पर भारत की नौसैनिक शक्ति पहले ही दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रही है। अब समुद्र की गहराइयों में भी भारत ने अपनी क्षमता को एक नई ऊंचाई दी है। 31 अगस्त, 2026 को भारतीय नौसेना में स्वदेशी रूप से निर्मित डाइविंग सपोर्ट वेसल यानी गोताखोरी सहायक पोत आईएनएस निपुण को शामिल किया गया। निस्तार श्रेणी का यह दूसरा पोत है और इसे विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने डिजाइन और निर्मित किया है।
निपुण केवल एक जहाज नहीं है। यह भारत की उस बदलती रक्षा नीति का प्रतीक है जिसमें देश अब केवल हथियार खरीदने वाला राष्ट्र नहीं बल्कि अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों को स्वयं डिजाइन और तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। निपुण में करीब 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है। यह आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की दिशा में भारतीय नौसैनिक जहाज निर्माण क्षमता की बढ़ती ताकत को दिखाता है।
निपुण की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गहरे समुद्र में काम करने की क्षमता है। यह सैचुरेशन डाइविंग के साथ एयर और हेलिओक्स डाइविंग में भी सहायता कर सकता है। इसके अलावा इसमें पानी के भीतर निरीक्षण और हस्तक्षेप के लिए दूर से संचालित होने वाली प्रणालियां मौजूद हैं। इसकी विशेष गोताखोरी व्यवस्था, सटीक स्थिति बनाए रखने की क्षमता, जीवन रक्षक और चिकित्सा सुविधाएं इसे लंबे और जटिल समुद्री अभियानों के लिए उपयोगी बनाती हैं।
इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पनडुब्बी बचाव अभियानों में दिखाई देगा। समुद्र के भीतर किसी पनडुब्बी के साथ आपात स्थिति उत्पन्न होने पर समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। निपुण ऐसे अभियानों में सहायता देने और संकट में फंसे नौसैनिकों तक पहुंचने की नौसेना की क्षमता को मजबूत करेगा। नौसेना के अनुसार इसकी विशेष क्षमताएं भारत को इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद पनडुब्बी बचाव साझेदार के रूप में स्थापित करने में मदद करेंगी।
इससे भारत की समुद्र के भीतर निगरानी, बचाव, मलबा हटाने, जलमग्न वस्तुओं के निरीक्षण और अन्य विशेष अभियानों की क्षमता भी बढ़ेगी। यानी अब भारतीय नौसेना की शक्ति केवल समुद्र की सतह तक सीमित नहीं रहेगी। जरूरत पड़ने पर वह समुद्र की गहराइयों में भी लंबे और जटिल अभियान अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकेगी।
निपुण की खासियत यह भी है कि यह बदलाव अकेले नहीं आया है। हाल के वर्षों में भारत ने स्वदेशी युद्धपोतों, पनडुब्बी रोधी पोतों, गोताखोरी सहायता पोतों और अन्य विशेष नौसैनिक प्लेटफॉर्म के निर्माण पर जोर बढ़ाया है। 2026 में स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट की परियोजना और पनडुब्बी रोधी पोतों की श्रृंखला भी इसी दिशा का हिस्सा हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि भारत अपनी समुद्री सुरक्षा के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करते हुए घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत कर रहा है। इससे भारतीय शिपयार्ड, रक्षा कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और छोटे उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश अपनी जरूरत के अनुसार विशेष सैन्य प्रणालियां विकसित करने की क्षमता हासिल कर रहा है।
निपुण के साथ भारत की समुद्री शक्ति का एक नया अध्याय शुरू हुआ है। अब चुनौती केवल समुद्र पर अपनी मौजूदगी बनाए रखने की नहीं है। चुनौती समुद्र की गहराइयों तक अपनी पहुंच, निगरानी और बचाव क्षमता को मजबूत करने की भी है। आईएनएस निपुण इसी बदलते भारत की पहचान है, जहां आत्मनिर्भरता केवल एक संकल्प नहीं बल्कि समुद्र की गहराइयों तक दिखाई देने वाली वास्तविक क्षमता बन रही है।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम…