12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वां BRICS लीडर्स समिट होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी मेजबानी करेंगे। इससे एक दिन पहले 11 सितंबर को BRICS बिजनेस फोरम और वीमेंस बिजनेस अलायंस का सत्र भी आयोजित किया जाएगा।
BRIC की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें सामिल हुआ और यह BRIC से BRICS बना। इसके बाद समूह का विस्तार होता गया। आज इसमें 11 पूर्ण सदस्य देश हैं। ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। इसके अलावा 10 साझेदार देश भी इससे जुड़े हैं।
इन देशों को एक साथ लाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि ये सभी वैश्विक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ की महत्वपूर्ण आवाज हैं। इनके सामने विकास, रोजगार, ऊर्जा, व्यापार, तकनीक और वित्त से जुड़ी कई समान चुनौतियां हैं। इसलिए BRICS में बातचीत केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती। यहां यह भी तय करने की कोशिश होती है कि बदलती दुनिया में आपसी सहयोग को कैसे मजबूत किया जाए।
दुनिया तेजी से बदल रही है। आर्थिक ताकत का संतुलन बदल रहा है, देशों के बीच व्यापार के तरीके बदल रहे हैं और तकनीक ने सहयोग के साथ साथ नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में दुनिया के कई उभरते देशों का एक साथ बैठना और अपनी प्राथमिकताओं पर बात करना अपने आप में महत्वपूर्ण है। BRICS इसी जरूरत से बना एक ऐसा मंच है, जिसकी भूमिका पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है।
भारत के लिए यह आयोजन इसलिए भी खास है क्योंकि इस बार BRICS का स्वरूप पहले से काफी बड़ा हो चुका है। भारत पहले ही देश के 25 से अधिक शहरों में BRICS से जुड़े 350 से ज्यादा कार्यक्रम और उच्च स्तरीय संवाद आयोजित कर चुका है। यानी 11 से 13 तक होने वाला शिखर सम्मेलन केवल दो दिन का कार्यक्रम नहीं है। इसके पीछे पूरे साल चली बैठकों और चर्चाओं की एक लंबी प्रक्रिया है।
इस बार भारत ने अपनी अध्यक्षता के लिए जो थीम चुनी है, वह भी काफी कुछ बताती है। “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी”। सरल शब्दों में कहें तो भारत ऐसी दुनिया की बात कर रहा है जो संकट के समय टिक सके, नई तकनीक को अपनाए, एक दूसरे के साथ सहयोग करे और विकास के साथ पर्यावरण का भी ध्यान रखे। इसके पीछे “ह्यूमैनिटी फर्स्ट” का विचार रखा गया है।
नई दिल्ली में होने वाली बैठक में कई ऐसे मुद्दे सामने होंगे जिनका असर आने वाले वर्षों में आम लोगों और कारोबार दोनों पर पड़ सकता है। व्यापार को आसान बनाना हो, देशों के बीच भुगतान व्यवस्था को बेहतर करना हो या फिर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना हो, इन सभी विषयों पर चर्चा होगी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी बातचीत का एक बड़ा विषय होगा। आज AI केवल तकनीक की दुनिया की चर्चा नहीं रह गया है। इसका असर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, उद्योग और प्रशासन तक पहुंच चुका है। ऐसे में BRICS देशों के बीच AI और डिजिटल तकनीक को लेकर सहयोग भविष्य में काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा भी बड़ी चिंता है। दुनिया ने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होने पर ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर उसका असर कितनी तेजी से दूसरे देशों तक पहुंचता है। इसलिए मजबूत सप्लाई चेन, ऊर्जा सहयोग और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे विषय BRICS की चर्चाओं में अहम हैं।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आने की पुष्टि हो चुकी है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी शामिल होने की उम्मीद है। यदि उनका भारत दौरा होता है तो यह खास तौर पर महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि 2019 में ममल्लापुरम में प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी अनौपचारिक मुलाकात के बाद यह उनका पहला भारत दौरा होगा। ऐसे में BRICS की बैठक के अलावा दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावनाएं भी इस यात्रा को महत्वपूर्ण बनाएंगी।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सिसी, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली समेत कई देशों के नेता इसमें हिस्सा लेंगे। बेलारूस, कजाकिस्तान, मलेशिया और थाईलैंड जैसे साझेदार देशों के नेता भी इस प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की भागीदारी की भी उम्मीद है।
इतने सारे देशों के शीर्ष नेतृत्व का एक जगह आना अपने आप में भारत के लिए बड़ा अवसर है। BRICS की मेजबानी से भारत को अपनी प्राथमिकताओं को इस मंच के जरिए आगे रखने का अवसर मिलेगा। भारत लंबे समय से ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात करता रहा है। BRICS इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए एक स्वाभाविक मंच है।
भारत पहले भी BRICS की अध्यक्षता कर चुका है। 2012, 2016 और 2021 में भारत ने इसकी कमान संभाली थी। हर बार परिस्थितियां अलग थीं। 2012 में विकास और वित्तीय सहयोग पर जोर रहा। 2016 में आतंकवाद और सुरक्षा का मुद्दा प्रमुख रहा। 2021 में दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही थी और बहुपक्षीय सहयोग की जरूरत पहले से कहीं अधिक थी।
2026 में परिस्थितियां फिर अलग हैं। अब BRICS का विस्तार हो चुका है। दुनिया में भू राजनीतिक तनाव बढ़ा है। व्यापार के पुराने रास्तों और व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं। AI जैसी तकनीक तेजी से दुनिया बदल रही है। ऊर्जा और जलवायु सुरक्षा पहले से बड़ी चुनौती बन चुकी है।
ऐसे समय में भारत के सामने केवल एक सफल सम्मेलन आयोजित करने की जिम्मेदारी नहीं है। असली चुनौती यह होगी कि अलग-अलग हितों वाले इतने देशों को उन मुद्दों पर एक साथ कैसे लाया जाए जिन पर साझा सहमति बन सकती है।
अनमोल दुबे
आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम…