भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं था। यह बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका, आर्थिक सहयोग की नई संभावनाओं और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर था। तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस, चीन, ईरान सहित कई देशों के नेताओं के साथ बातचीत की। इन बैठकों में युद्ध और शांति से लेकर व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था तक अनेक विषयों पर चर्चा हुई।
इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि भारत ने अपनी कूटनीति को केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा। उसने एक साथ रूस के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने, चीन के साथ सीमा पर शांति बनाए रखने, पश्चिम एशिया में स्थिरता की वकालत करने और विकासशील देशों के हितों को वैश्विक मंच पर रखने का प्रयास किया।
तीन दिनों में क्या हुआ और भारत को क्या मिला?
पहला दिन:
11 सितंबर, को प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन से जुड़ी महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकों की शुरुआत की। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बातचीत में दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत करने पर चर्चा हुई। आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, रक्षा और औद्योगिक क्षेत्र में साझेदारी को आगे बढ़ाना भारत के लिए महत्वपूर्ण है। रूस के साथ संबंधों का महत्व इसलिए भी है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा उपकरणों और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग की आवश्यकता है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ बातचीत में पश्चिम एशिया की स्थिति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया गया। भारत के लिए यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और भारतीय कामगारों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। इसलिए भारत ने शांति, बातचीत और सुरक्षित समुद्री आवागमन को प्राथमिकता दी।
प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी मुलाकात की। इससे भारत को वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों के हितों से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाने का अवसर मिला।
दूसरा दिन:
12 सितंबर, को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बैठक सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक पड़ाव रही। दोनों देशों के संबंधों में सीमा विवाद और आपसी अविश्वास जैसी चुनौतियां हैं। ऐसे में दोनों नेताओं की बातचीत से संबंधों को स्थिर बनाने का प्रयास हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने सीमा पर शांति और स्थिरता को द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति का आवश्यक आधार बताया। दोनों पक्षों ने व्यापार, आर्थिक संबंधों और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की।
इस बैठक का महत्व केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है। दोनों देश एशिया की बड़ी आर्थिक शक्तियां हैं। यदि सीमा पर तनाव कम होता है और व्यापारिक संबंधों में सुधार आता है तो क्षेत्रीय स्थिरता को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसे किसी बड़े समझौते का अंतिम परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बातचीत के निर्णयों को जमीन पर कितना लागू किया जाता है।
इसी दिन ब्रिक्स नेताओं ने 45 पृष्ठों वाले नई दिल्ली घोषणापत्र को स्वीकार किया। इसमें 140 बिंदुओं के माध्यम से शांति, आर्थिक सहयोग, स्वास्थ्य, जलवायु, व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे विषयों को शामिल किया गया।
तीसरा दिन:
13 सितंबर, को सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण के देशों की भूमिका, आर्थिक विकास और साझा चुनौतियों पर जोर दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विकासशील देश वैश्विक संकटों का सामना सबसे आगे रहकर करते हैं, लेकिन निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी भूमिका सीमित है। उन्होंने वैश्विक दक्षिण को केवल नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने में योगदान देने वाला समूह बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स के माध्यम से युवा राजनयिकों और नीति निर्माताओं को बातचीत, कानून और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की बात भी रखी। इसका उद्देश्य विकासशील देशों में ऐसी नेतृत्व क्षमता तैयार करना है जो वैश्विक निर्णयों को प्रभावित कर सके।
तीसरे दिन भारत ने दक्षिण अफ्रीका, कजाकिस्तान, फिलीपींस, मिस्र और अन्य देशों के नेताओं के साथ भी बातचीत की। इन बैठकों में व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, कृषि, तकनीक, बुनियादी ढांचे और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। फिलीपींस के साथ रक्षा, अंतरिक्ष, रेल, डिजिटल वित्त, शिक्षा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार हुआ।
भारत के लिए ब्रिक्स सम्मेलन के प्रमुख लाभ
1. व्यापार और आर्थिक विकास को नई गति
ब्रिक्स में भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर आर्थिक सहयोग का है। समूह के देशों ने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भुगतान के विकल्प बढ़ाना और लेनदेन को अधिक सुगम बनाना है।
भारत के लिए इसका लाभ यह हो सकता है कि भारतीय कंपनियों को विभिन्न देशों के साथ व्यापार करते समय भुगतान के नए विकल्प मिलें। यदि इन व्यवस्थाओं को सुरक्षित, पारदर्शी और व्यावहारिक बनाया जाता है तो निर्यातकों और आयातकों के लिए लेनदेन की लागत कम हो सकती है। हालांकि, इससे तत्काल विदेशी मुद्रा की आवश्यकता समाप्त नहीं होगी। ऐसी व्यवस्था की सफलता के लिए मजबूत बैंकिंग तंत्र और सभी देशों की सहमति जरूरी होगी।
ब्रिक्स के बड़े बाजार भारतीय दवाओं, कृषि उत्पादों, मशीनों, कपड़ों, वाहन कलपुर्जों और डिजिटल सेवाओं के लिए अवसर पैदा कर सकते हैं। इससे निर्यात बढ़ सकता है और देश में रोजगार के नए अवसर बन सकते हैं।
2. MSME और छोटे कारोबारों को लाभ
नई दिल्ली घोषणापत्र में छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए ऋण तथा व्यापारिक वित्त तक पहुंच आसान बनाने पर जोर दिया गया। निर्यात करने वाले छोटे कारोबारों के लिए ऋण आकलन से जुड़े दिशानिर्देशों का भी स्वागत किया गया।
भारत में लाखों छोटे कारोबारी रोजगार और उत्पादन का आधार हैं। यदि उन्हें ब्रिक्स देशों में व्यापार करने के लिए आसान ऋण, बेहतर बाजार और सरल भुगतान व्यवस्था मिलती है तो वे अपने कारोबार का विस्तार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, भारत का कोई छोटा औषधि निर्माता अफ्रीका के बाजार में प्रवेश कर सकता है या कोई तकनीकी कंपनी दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी सेवाएं दे सकती है।
इससे बड़े उद्योगों के साथ छोटे उद्यमों की भागीदारी भी बढ़ेगी।
3. चीन के साथ संबंध सुधरने की संभावना
भारत और चीन के संबंधों में स्थिरता दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। सीमा पर तनाव कम होने से सुरक्षा संबंधी चिंताओं को संभालने और आर्थिक संवाद को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर वातावरण बन सकता है। मोदी और शी जिनपिंग की बैठक में सीमा पर शांति, व्यापारिक चिंताओं और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।
भारत को इससे दो संभावित लाभ हो सकते हैं। पहला, सीमा पर स्थिरता से सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों को अधिक व्यवस्थित दिशा मिल सकती है। दूसरा, व्यापार और निवेश से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के नए अवसर बन सकते हैं।
फिर भी, सीमा विवाद का समाधान केवल एक बैठक से नहीं होगा। भारत के लिए अपनी सुरक्षा, राष्ट्रीय हित और आर्थिक आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना आवश्यक रहेगा।
4. ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार
रूस और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भारत के संबंध ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में ऊर्जा सहयोग, पश्चिम एशिया की स्थिति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने नाविकों की सुरक्षा और संकट के समय सहायता के लिए Seafarers Emergency Support Network का प्रस्ताव रखा।
भारत का विदेशी व्यापार समुद्री मार्गों पर बहुत निर्भर है। यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ता है या महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो माल ढुलाई, बीमा और ऊर्जा आयात की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में समुद्री सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारत के व्यापारिक हितों की रक्षा कर सकता है।
ऊर्जा क्षेत्र में रूस और अन्य ब्रिक्स देशों के साथ सहयोग से भारत को आपूर्ति के विविध स्रोत विकसित करने में मदद मिल सकती है। इससे भविष्य में ऊर्जा संबंधी जोखिमों को संभालने की क्षमता मजबूत हो सकती है।
5. आतंकवाद के खिलाफ भारत की आवाज मजबूत
नई दिल्ली घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की बात कही गई। घोषणापत्र में आतंकवादियों और उनके समर्थकों को जवाबदेह बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
भारत लंबे समय से आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग करता रहा है। ब्रिक्स जैसे मंच पर इस विषय को स्थान मिलने से भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला। इससे आतंकवाद के वित्तपोषण, सीमा पार आतंकवाद और आतंकी नेटवर्क के विरुद्ध सहयोग बढ़ाने की दिशा में बातचीत आगे बढ़ सकती है।
हालांकि, घोषणापत्र में किसी मुद्दे का उल्लेख होना और उसके आधार पर ठोस कार्रवाई होना अलग-अलग बातें हैं। भारत को आगे भी देशों के साथ लगातार संवाद और प्रमाण आधारित कूटनीति करनी होगी।
6.वैश्विकसंस्थाओं में भारत की भूमिका
भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग दोहराई। ब्रिक्स देशों ने अधिक प्रतिनिधित्व वाली और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और जनसंख्या में विकासशील देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है। फिर भी, अंतरराष्ट्रीय निर्णय लेने वाली कई संस्थाओं की संरचना पुरानी है। भारत चाहता है कि वैश्विक संस्थाओं में उसकी आर्थिक और जनसंख्या संबंधी भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व मिले।
ब्रिक्स के माध्यम से भारत विकासशील देशों को एक साझा मंच दे सकता है। इससे व्यापार, जलवायु, वित्त, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत की बात अधिक प्रभावशाली ढंग से सामने आ सकती है।
7. तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वास्थ्य में अवसर
सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, नई तकनीक, डिजिटल स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवनशैली पर सहयोग की दिशा में चर्चा हुई। चीन ने ब्रिक्स AI Open Source Zone जैसे प्रस्ताव भी रखे।
भारत के लिए यह क्षेत्र भविष्य की अर्थव्यवस्था का आधार बन सकता है। भारतीय स्टार्टअप और तकनीकी संस्थान ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर डिजिटल सेवाओं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि तकनीक और स्वास्थ्य समाधान विकसित कर सकते हैं।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में संक्रामक बीमारियों की पहचान के लिए Early Warning System पर सहयोग से भारत को भी लाभ मिल सकता है। समय रहते बीमारी के फैलाव की जानकारी मिलने पर स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर ढंग से तैयार किया जा सकता है।
8. महिलाओं और युवाओं के लिए नए अवसर
ब्रिक्स Women’s Business Alliance ने महिला कारोबारियों के लिए वित्त, बाजार, तकनीक, कौशल और डिजिटल अवसरों तक पहुंच बढ़ाने की सिफारिशों का समर्थन किया।
भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले कारोबारों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाना महत्वपूर्ण है। यदि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक नेटवर्क और प्रशिक्षण कार्यक्रम मजबूत होते हैं तो महिला उद्यमियों को नए ग्राहक, निवेश और साझेदार मिल सकते हैं।
युवाओं के लिए भी विज्ञान, तकनीक, शोध, उद्यमिता और राजनयिक प्रशिक्षण के अवसर बढ़ सकते हैं। यह भारत की युवा आबादी को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में उपयोगी कदम होगा।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम…