भारत ने समुद्र की गहराइयों को समझने और वहां छिपे वैज्ञानिक तथा प्राकृतिक संसाधनों की खोज करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। 9 सितंबर, 2026 को कोलकाता के ऋषि बंकिम शिपयार्ड में भारत के अत्याधुनिक महासागरीय अनुसंधान पोत ‘ओआरवी सागर मंथन’ का जलावतरण किया गया। करीब 840 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जा रहा यह पोत भारत के समुद्री अनुसंधान और स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
‘सागर मंथन’ को रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड यानी जीआरएसई ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान केंद्र यानी एनसीपीओआर के लिए डिजाइन और निर्मित किया है। केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपनी पत्नी मंजू सिंह के साथ वर्चुअल माध्यम से पोत का जलावतरण किया। परंपरा के अनुसार मंजू सिंह ने पोत का नामकरण किया।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय तक समुद्री अनुसंधान के लिए विदेशों में निर्मित पोतों पर निर्भर रहा है। ‘सागर मंथन’ के निर्माण के साथ भारत ने इस दिशा में एक नई क्षमता विकसित करने का संकेत दिया है।
‘सागर मंथन’ को भारत के दीप महासागर मिशन के तहत तैयार किया जा रहा है। यह मिशन समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिक अनुसंधान, समुद्री संसाधनों की खोज और समुद्री प्रौद्योगिकी को मजबूत करने की दिशा में देश की प्रमुख पहल है।
पोत को हर मौसम में काम करने के लिए तैयार किया गया है। यह कठिन समुद्री परिस्थितियों में भी अनुसंधान कार्य कर सकेगा। दक्षिणी महासागर जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी इसके संचालन की क्षमता विकसित की गई है। इसकी अनुमानित सेवा अवधि करीब 30 वर्ष होगी।
करीब 89.5 मीटर लंबा और 18.8 मीटर चौड़ा यह पोत लगभग 5,900 टन का है। इसकी अधिकतम गति करीब 14 नॉट बताई गई है। इसे समुद्र की सतह से लेकर लगभग 6,000 मीटर की गहराई तक होने वाले अनुसंधान कार्यों के लिए तैयार किया गया है।
इसकी सबसे खास बात यह है कि यह केवल एक जहाज नहीं है। यह अपने भीतर कई तरह की वैज्ञानिक सुविधाएं रखने वाला चलता फिरता समुद्री अनुसंधान केंद्र है। इसमें वैज्ञानिकों के लिए प्रयोगशालाएं और अलग अलग प्रकार के समुद्री अध्ययन के लिए विशेष उपकरण लगाए जाएंगे।
‘सागर मंथन’ का महत्व केवल समुद्री संसाधनों की खोज तक सीमित नहीं है। इससे मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़े जलवायु परिवर्तन और समुद्री पर्यावरण को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
महासागर पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था को प्रभावित करने वाला प्रमुख तत्व है। समुद्र के तापमान, जल की गति, वायुमंडलीय परिस्थितियों और समुद्री पर्यावरण में होने वाले बदलावों का अध्ययन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए जरूरी है।
पोत में वायुमंडलीय आंकड़े जुटाने और समुद्री जल के विभिन्न स्तरों का अध्ययन करने की सुविधा होगी। सीटीडी प्रोफाइलिंग के माध्यम से समुद्र के अलग अलग स्तरों पर चालकता, तापमान और गहराई से जुड़े आंकड़े जुटाए जा सकेंगे।
भारत के समुद्री अनुसंधान के इतिहास में ‘सागर कन्या’ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। करीब 43 वर्ष पुराने इस अनुसंधान पोत को भारत ने 1983 में जर्मनी से खरीदा था। लंबे समय तक इसने भारतीय वैज्ञानिकों को समुद्र के विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए मंच उपलब्ध कराया।
अब ‘सागर मंथन’ धीरे-धीरे ‘सागर कन्या’ का स्थान लेगा। नए पोत में आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण और गहरे समुद्र में काम करने की बेहतर क्षमता होने के कारण भारतीय वैज्ञानिकों को पहले की तुलना में अधिक व्यापक अनुसंधान सुविधाएं मिल सकेंगी।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम…