मखाना का नाम सुनते ही दिमाग में ‘सुपर फूड’ आ जाता है, मखाना जितना को खाना जितना ज्यादा पौष्टिक होता है इसे निकलना उतना ही ज्यादा मुश्किल होता है। किसान घंटो पानी में रह कर तालाब की तलहटी से बीज निकाले जाते हैं। इसके बाद इन बीजों को अच्छी तरह साफ कर धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें भुना कर पारंपरिक तरीके से लकड़ी के हथौड़े से एक एक दाने को फोड़ा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया अनुभव, धैर्य और अत्यधिक मेहनत वाली है पर वर्षों तक यह विडंबना रही कि इतनी कठिन मेहनत करने के बावजूद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था।

वैश्विक बाजार तक पहुंच का अभाव, सीमित विपणन व्यवस्था और बिचौलियों पर निर्भरता के कारण किसानों की आय उनकी मेहनत के अनुरूप नहीं बढ़ पाती थी। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। पहली बार बिहार के दरभंगा से समुद्री मार्ग के जरिए 7 मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाने का कनाडा निर्यात किया गया है। यह बिहार के मखाना किसानों के लिए नई संभावनाओं का द्वार है।
कनाडा भेजी गई खेप इस बात का संकेत है कि बिहार का मखाना अब केवल देश के बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है और भारतीय उत्पादों के प्रति विश्वास भी मजबूत हुआ है।
विदेशों में भारतीय मूल के लोगों के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच मखाने की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। कम वसा, अधिक प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण इसे एक पौष्टिक आहार के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। यही कारण है कि साधारण मखाने के साथ अब फ्लेवर्ड मखाने की मांग भी तेजी से बढ़ रही है।

बिहार देश के कुल मखाना उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। विशेष रूप से दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया और सहरसा जैसे जिलों में बड़ी संख्या में किसान इस खेती से जुड़े हैं। ऐसे में यदि निर्यात लगातार बढ़ता है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव लाखों ग्रामीण परिवारों की आय पर दिखाई देगा।

यह उपलब्धि इस बात का भी प्रमाण है कि जब किसानों को बाजार, तकनीक और बेहतर अवसर मिलते हैं, तो उनकी मेहनत का दायरा गांव से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुंच जाता है। वर्षों तक पानी में उतरकर कठिन परिश्रम करने वाले किसान आज यह महसूस कर सकते हैं कि उनकी मेहनत केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रही, बल्कि सात समंदर पार भी उसकी मांग है।

जब किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिलता है, तो उसकी आय के साथ-साथ उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। बेहतर आमदनी से वह अपने बच्चों की शिक्षा, परिवार के स्वास्थ्य, खेती में नई तकनीकों और बेहतर संसाधनों पर निवेश कर सकता है। यही बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है और कृषि को अधिक समृद्ध एवं टिकाऊ बनाता है।
दरभंगा से शुरू हुई यह यात्रा आने वाले समय में बिहार के हजारों मखाना किसानों के लिए नई आशा लेकर आई है। यह निर्यात किसान की मेहनत को विश्व बाजार तक पहुंचाने की शुरुआत है।

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By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

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