किसी भी देश की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात उसके बहादुर सैनिकों की बहादुरी से नहीं होती। इसके लिए जरूरी है कि सैनिकों के हाथ में मौजूद हथियार, उपकरण और तकनीक भी देश की अपनी क्षमता से तैयार हों। लंबे समय तक भारत की सेनाओं को रक्षा जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 सितम्बर को श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में इसी बदलाव की कहानी साझा की।
प्रधानमंत्री ने बताया कि पहले सेना के लिए छोटी से छोटी जरूरत के सामान के लिए भी लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता था। इसके बाद सरकार ने तीनों सेनाओं के साथ मिलकर उनकी जरूरतों की सूची तैयार की और भारतीय कंपनियों को इन वस्तुओं के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया। यह कदम केवल खरीद की प्रक्रिया में बदलाव नहीं था। इसके पीछे भारत को रक्षा निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की सोच थी।
आज इस सोच का परिणाम देश की रक्षा उत्पादन क्षमता में दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री के अनुसार भारत का रक्षा उत्पादन अब करीब दो लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और देश का रक्षा विनिर्माण अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर है।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव रक्षा निर्यात के क्षेत्र में दिखाई देता है। प्रधानमंत्री ने बताया कि 2013-14 में भारत करीब 600 से 700 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात करता था। आज यह आंकड़ा करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यानी भारत केवल अपनी सेनाओं की जरूरतें पूरी करने की दिशा में ही आगे नहीं बढ़ा, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों को भी रक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित कर रहा है।
यह बदलाव आत्मनिर्भर भारत की व्यापक सोच का हिस्सा है। रक्षा क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ने से देश की रणनीतिक स्वतंत्रता मजबूत होती है। आयात पर निर्भरता कम होती है और देश के भीतर नई तकनीक, अनुसंधान और निर्माण की संभावनाएं बढ़ती हैं। इसके साथ ही निजी क्षेत्र और भारतीय कंपनियों के लिए भी नए अवसर पैदा होते हैं।
रक्षा उत्पादन में यह वृद्धि युवाओं के लिए भी एक बड़ी संभावना लेकर आई है। इंजीनियरिंग, अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष तकनीक और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में रोजगार और नवाचार के नए रास्ते खुल रहे
आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम…