बुंदेलखण्ड की धरती सख़्त ज़रूर है, पर यहाँ के दिल उतने ही कोमल हैं।
यहाँ की मोहब्बत किसी शहरी दिखावे की तरह नहीं, बल्कि बुन्देली मिट्टी की खुशबू जैसी होती है , सच्ची, सीधी और आत्मा तक पहुँचने वाली।
कहते हैं यहाँ का प्यार वैसा होता है “जैसे बारिश की पहली फुहार”
जो सूखी धरती को भी मुस्कुराना सिखा देती है।
बुंदेलखण्ड में प्रेम “आई लव यू” से नहीं, “कौनऊ तकलीफ़ तौ नहियां तुम्हें ?” जैसे छोटे से सवालों से शुरू होता है।
लड़का जब खेत में काम करता हुआ लड़की की एक झलक देख ले या लड़की जब अपनी ओढ़नी से चेहरा ढककर मुस्करा दे तभी समझ जाइए कि बस वहीं से एक जीवन भर चलने वाली कहानी जन्म ले रही होती है। ठेठ बुंदेली भाषा में यहां के मौडा मौडियन द्वारा कहे गए दिलकश प्रेम संवाद किसी पवित्र ग्रंथ से कम नहीं होते । यहाँ किसी के पास वक़्त नहीं होता दिखावे का, लेकिन जब कोई किसी के लिए “मन में” जगह बना लेता है तो वो जगह कभी भी खाली नहीं होती।
जैसे पहली बारिश सब कुछ नया कर देती है वैसे ही बुंदेली प्यार भी इंसान को भीतर से बदल देता है। एकदम साफ़ दिल। यहाँ के प्रेम में न तो स्वार्थ होता है और ना ही कोई छल-कपट।
यहाँ तो काऊ की (किसी की) एक मुस्कान ही इकरार बन जाती है,
और एक चिट्ठी सालों तक दिल की धड़कन। बुंदेलखण्ड के गाँवों में आज भी कोई लड़का शाम को चौपाल पर बैठा आसमान निहारता है तो मानो बादलों से वो बस यही कह रहा होता है “तुम बरसो या ना बरसो, वा मौडी मुस्कराय दई, बस हमाई जिंदगी सफल हो गई ।
बुंदेलखण्ड की मिट्टी में प्रेम की परंपरा सदियों पुरानी है। महोबा, झांसी, कालपी, जालौन , खजुराहो, होशंगाबाद,ओरछा जैसी जगहें तो सिर्फ़ एक उदाहरण भर हैं। आप कभी बुंदेलखंड जाएं तो देखेंगे कि हर जगह प्रेम की कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं।
जहाँ एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई का शौर्य और आल्हा-ऊदल की वीरता का गीत गूंजता है, वहीं दूसरी ओर साधारण लोगों के दिलों में प्रेम का वही पुराना संगीत आज भी बजता है।
यहाँ का प्यार नाजुक नहीं बल्कि बेहद मजबूत होता है। यह एक कच्चे धागे की डोर भर नहीं होता। दरअसल यहाँ कोई किसी को “फॉलो” नहीं करता, यहाँ हर कोई “साथ निभाता” है।
टेक्नोलॉजी के दौर में जहाँ रिश्ते “स्वाइप” पर शुरू होते हैं और “ब्लॉक” पर खत्म…बुंदेलखण्ड अब भी दिल से दिल तक का सफ़र पैदल तय करता है। यहाँ आज भी कोई प्रेमी बिना मोबाइल के घंटों अपने महबूब का इंतज़ार करता है और जब मिलन होता है, तो बस एक शब्द
” काय तुम कैसे हो..? कछु खाय के आए घर से के कछु खब जाए…? ”
वो पूरी कविता बन जाता है।
बुंदेली प्यार किसी मौसम की तरह नहीं आता और ना ही चला जाता है,
वो तो एक संस्कार बनकर हमेशा के लिए जीवन का एक हिस्सा बन जाता है।
जब कोई बुंदेलखण्डी कहता है
“हम तौ अब तुम्हाए हो गए”
तो उसमें कोई झूठा वादा नहीं बल्कि एक प्रेम से परिपूर्ण भरोसा होता है। वो कहता नहीं बल्कि साथ निभाता है। सच में… बुंदेलखण्ड का प्यार वैसा ही होता है — जैसे बारिश की पहली फुहार । अचानक आता है और मन को भिगो देता है और फिर ज़िंदगी भर उस प्यारी सी ख़ुशबू को भुलाया नहीं जा सकता । कोई भुलाना चाहे तब भी नहीं भूला सकता। तो दोस्तों…ऐसा ही होता है बुंदेली प्यार….!
लेखक बुन्देली भाषा के अच्छे वक्ता हैl
