बुंदेलखंड की यह घटना सत्रहवीं सदी की है जिसमें राजस्थान के मेवाड़ राज्य की राजपूत रानी पद्मिनी की तर्ज़ पर मुग़ल आक्रान्ता अलीवर्दी खान से अपनी अस्मिता की पवित्रता की ख़ातिर बेतवा नदी में छलांग लगाकर आत्म बलिदान कर दिया और अलीवर्दी खान को ख़ाली हाथ लौटने पर मजबूर कर दिया था।
इस कहानी की शुरुआत झाँसी के क़रीब स्थित गाँव पालर से होती है जहां एक दाँगी परिवार में एक बालिका का जन्म होता है जिसका नाम कुमुद रखा जाता है।
कुमुद अद्भुत सौन्दर्य के व्यक्तित्व की धनी थी जिससे कुंजर नामक एक युवक अनुराग रखता था और कुमुद भी पसंद करती थी उसको। लेकिन कुमुद के चर्चे सैयद नगर के सूबेदार अलीवर्दी खान तक पहुँचे जो उस समय कालपी और एरच पर आधिपत्य जमाए था
अलीवर्दी खान के नापाक इरादे जाग उठे और वह किसी भी क़ीमत पर कुमुद को प्राप्त करने हेतु आतुर हो उठा।
उस विराटा दाँगी बाहुल्य क्षेत्र था तो कुमुद अपने पिता के साथ विराटा पहुँच गई सुरक्षा कारणों के चलते, लेकिन वहशी दरिन्दे अलीवर्दी खान ने आक्रमण कर दिया।
कुंजर और दाँगी सैनिकों का युद्ध हुआ लेकिन युद्ध में दाँगी सैनिकों को कमजोर पड़ते देखकर कुमुद ने रानी पद्मिनी को याद करते हुए आत्मोत्सर्ग का मार्ग चुना और बेतवा नदी में अपने पिता सहित छलांग लगाकर समाप्त कर लिया अपने शरीर को।
इस विषय को लेकर साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा ने एक उपन्यास भी लिखा है विराटा की पद्मिनी नाम से।
यह स्थान झाँसी मुख्यालय से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर है। जिसका मार्ग रामनगर से होकर जाता है कुछ रास्ता ऊबड़ खाबड़ भी है लेकिन आगे पक्की सड़क मिल जाती है।
इस स्थान पर नदी के बीचोंबीच टापू पर शिव मंदिर है और दाँगी समाज के सहयोग से पद्मिनी का मंदिर भी बन रहा है।
मैं जब यहाँ पहुँचा तो एक अजीब घटना घटी जो गाँव के लोगों की सिधाई को बताती है, एक व्यक्ति से इस घटना के विषय में पूछने पर उसने छायमें बुलाया और फिर बड़े आराम से कह दिया कि मंदिर में पुजारी सब बताएँगे मुझे जानकारी नहीं है।
टापू पर काफ़ी सघन जंगल टाइप भी है और बहुत विहंगम बेतवा का नजारा देखने को मिलता है यहाँ से।
मंदिर पर पुजारी से भी बात की और वहाँ पर स्थानीय लोगों ने भी घटना के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
वापस लौटते वक्त एक स्थानीय युवक ने रोक लिया और बताया कि इस स्थान पर पहले पुरातत्व विभाग के माध्यम से थोड़ा बहुत काम हुआ था लेकिन अब कोई देख रेख नहीं न ही कोई विकास।
शासन प्रशासन से अनुरोध है कि इस स्थान को यदि सरकारी मदद से सजाया संवारा जाए तो इससे न केवल बुंदेलखंड की इन ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी आम आदमी की स्म्रति में ज़िंदा बनी रहेगी बल्कि ऐसे अद्भुत स्थान को पर्यटन का रूप भी दिया जा सकता है जिससे सरकार की आय भी बढ़ सकती है और स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसरों का भी अवसर उपलब्ध होगा।
पं०राजू शर्मा नौटा