बोलेगा बुंदेलखंड – स्मार्टफोन और इंटरनेट ने हमारी जिंदगी को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। पढ़ाई, मनोरंजन, खरीदारी और संवाद, हर काम अब कुछ ही क्लिक में हो जाता है। लेकिन जिस तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वही तकनीक आज बच्चों के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनती जा रही है। खासकर ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर उपलब्ध अनियंत्रित सामग्री बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर गहरा प्रभाव डाल रही है। ऐसे समय में सरकार द्वारा पिछले दो वर्षों में 50 ओटीटी एप्स को ब्लॉक करने का फैसला डिजिटल सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के निर्देश पर जिन ओटीटी एप्स पर कार्रवाई की गई, उनका मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील, अभद्र और सामाजिक मूल्यों के विरुद्ध सामग्री पर रोक लगाना था। डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती ऐसी सामग्री केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बच्चों और किशोरों के व्यवहार, सोच और जीवनशैली को भी प्रभावित करती है। कम उम्र में ऐसे कंटेंट का संपर्क बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति, मानसिक तनाव, पढ़ाई से दूरी और गलत आदतों को बढ़ावा दे सकता है।

सरकार ने केवल एप्स पर कार्रवाई ही नहीं की, बल्कि बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराने के लिए कई अन्य कदम भी उठाए हैं। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 के तहत बच्चों का डेटा एकत्र करने से पहले अभिभावकों की सहमति अनिवार्य की गई है। इसका उद्देश्य बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता की रक्षा करना और कंपनियों को उनकी जानकारी का दुरुपयोग करने से रोकना है। इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्मों को आपत्तिजनक और गैरकानूनी सामग्री हटाने के लिए भी अधिक जवाबदेह बनाया गया है।

हालांकि केवल सरकारी कार्रवाई से समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं होगा। बच्चों की डिजिटल सुरक्षा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिवार और विद्यालय की है। माता पिता को यह समझना होगा कि केवल मोबाइल या टैबलेट देकर जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। यह जानना भी जरूरी है कि बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है, कितना समय बिता रहा है और उसकी डिजिटल गतिविधियां किस दिशा में जा रही हैं। परिवार में संवाद और विश्वास का वातावरण बच्चों को गलत सामग्री से दूर रखने में सबसे प्रभावी उपाय हो सकता है।

विद्यालयों को भी डिजिटल साक्षरता को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए। बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि हर ऑनलाइन सामग्री उनके लिए उपयुक्त नहीं होती और डिजिटल दुनिया में भी नैतिकता तथा जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी वास्तविक जीवन में।

ओटीटी कंपनियों और सोशल मीडिया मंचों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। आयु सत्यापन, प्रभावी पैरेंटल कंट्रोल, स्पष्ट कंटेंट वर्गीकरण और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई जैसे उपायों को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। यदि तकनीकी कंपनियां अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाएं, तो बच्चों के लिए डिजिटल दुनिया कहीं अधिक सुरक्षित बन सकती है।

आज डिजिटल लत सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। सरकार द्वारा 50 ओटीटी एप्स को ब्लॉक करना इस दिशा में एक सकारात्मक और आवश्यक पहल है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार, अभिभावक, विद्यालय, तकनीकी कंपनियां और समाज मिलकर ऐसा डिजिटल वातावरण तैयार करें, जहां बच्चे तकनीक का उपयोग ज्ञान, रचनात्मकता और विकास के लिए करें, न कि उसके दुष्प्रभावों का शिकार बनें। सुरक्षित डिजिटल भविष्य ही स्वस्थ और सक्षम भारत की मजबूत नींव बन सकता है।

 

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By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

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