देश संसद लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। यही वह स्थान है जहां देश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होती है। नई नीतियां बनाई जाती हैं, नए कानून पारित किए जाते हैं और सरकार से जवाब मांगा जाता है।

आज यानी 20 जुलाई, 2026 से शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त, 2026 तक चलेगा। इस दौरान सरकार अनेक महत्वपूर्ण विधेयक और जनहित से जुड़े प्रस्ताव सदन के सामने रखने की तैयारी में है। परन्तु आज सदन के शुरू होते ही विपक्ष ने नारेबाजी कर सदन नहीं चलने दिया। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी है। लेकिन इस जिम्मेदारी के निर्वहन में सदन की कार्यवाही में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। क्योंकि सदन देश के करोड़ों करदाताओं की गाढ़ी मेहनत की कमाई से चलता है।

अगर हम आंकड़ो को देखें तो संसद की कार्यवाही पर देश का बहुत बड़ा धन खर्च होता है। संसद सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक चलती है। दोपहर के भोजन अवकाश को हटाने के बाद प्रतिदिन लगभग 6 घंटे की कार्यवाही होती है। इन दौरान सदन की कार्यवाही का प्रत्येक मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये का होता है। इस प्रकार संसद को एक दिन चलाने में लगभग 9 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पूरे सत्र में यह खर्च 150 से 200 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।

देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर संसद भेजती है कि वे उसकी समस्याओं को उठाएं, सरकार से जवाब मांगें और राष्ट्रहित में कानून बनाने में योगदान दें। पर जब सदन शुरू होते ही नारेबाजी, पोस्टर और तख्तियां दिखाकर लगातार हंगामा किया जाता है और कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है तब सबसे ज्यादा जनता का ही नुकसान होता है। इससे समय के साथ-साथ देश के करदाताओं का करोड़ों रुपये भी बर्बाद होता है। जिस समय का उपयोग कानून बनाने, जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने और सरकार से जवाब मांगने में होना चाहिए वह शोर और नारेबाजी में निकल जाता है।

संसद में विपक्ष सरकार से महंगाई, रोजगार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था जैसे अनेकों विषय पर जनता के सवाल पूछता है।

परन्तु जब सदन ही नहीं चलेगा तो ये प्रश्न पूछे भी नहीं जा सकेंगे। इसी प्रकार सरकार भी जो देशहित में कानून या सुधार लाना चाहती वह भी इन नारेबाजियों के कारण समय पर पारित नहीं हो पाते।

लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है लेकिन विरोध का सबसे प्रभावी माध्यम सदन के भीतर सार्थक बहस, तर्क और तथ्यों के आधार पर सरकार को घेरना है। यदि विपक्ष के पास मजबूत मुद्दे हैं तो उन्हें संसद के भीतर उठाकर सरकार को जवाब देने के लिए बाध्य करना चाहिए। लगातार हंगामा और कार्यवाही बाधित करना न तो लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल है और न ही जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप।

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By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

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