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धर्म और दर्शन में दीपावली का विविध अर्थ

दीपावली भारत में मनाए जाने वाले सबसे उल्लासपूर्ण पर्वों में से एक है। यह केवल दीप जलाने का उत्सव नहीं बल्कि अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और असत्य से सत्य की ओर बढ़ने का प्रतीक है।

दीपावली का एक महत्वपूर्ण पहलू घर और आसपास की साफ-सफाई है। लोग हफ्तों पहले से अपने घर, दुकान और गलियों की सफाई में लग जाते हैं। पुरानी और बेकार वस्तुएँ बाहर निकाल दी जाती हैं ताकि नये आरंभ के लिए जगह बने। यह परंपरा केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छ वातावरण के लिए भी आवश्यक है।

लोग नए कपड़े, बर्तन, आभूषण और घर-गृहस्थी की वस्तुएँ खरीदते हैं। व्यापारी इस दिन अपने खातों की नई शुरुआत करते हैं। किसानों के लिए भी यह त्यौहार खरीफ की फसल के आगमन का समय होता है।

पर कई बार मन में सवाल आता है कि आखिर दीपावली मनाई क्यों जाती है। भारत में सभी धर्मों में दीपावली को लेकर अपनी अलग-अलग कहानियां हैं।

सिख परंपरा:

सिख परंपरा में दीपावली का विशेष महत्व है। इस दिन गुरु हरगोविंद साहब को रिहाई मिली थी। उनके आगमन की खुशी में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर को दीपों से सजाया गया और तभी से यह दिन सिख इतिहास में आजादी और प्रकाश का प्रतीक बन गया।

बौद्ध समुदाय:

बौद्ध अनुयायियों के लिए भी दीपावली का विशेष महत्व है। बौद्ध परंपरा के अनुसार अठारह वर्षों के उपदेश और यात्राओं के बाद भगवान बुद्ध इसी दिन अपने नगर कपिलवस्तु लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में नगरवासियों ने दीप प्रज्वलित किए थे। तभी से स्मृति स्वरूप बौद्ध अनुयायी दीपावली मनाते हैं और अपने घर दीपों से आलोकित करते हैं।

जैन धर्म:

जैन परंपरा के लोगों के लिए भी दीपावली का विशेष महत्व है। उनकी आस्था के अनुसार इसी दिन भगवान महावीर को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए यह पर्व जैन समुदाय के लिए केवल उत्सव नहीं बल्कि मुक्ति और आत्मज्ञान की स्मृति का दिन है। इस अवसर पर वे दीप प्रज्वलित कर अपने घरों को आलोकित करते हैं और दीपावली मनाते हैं।

हिन्दू धर्म:

हिन्दू धर्म में दीपावली को लेकर कई कहानियाँ हैं।

भागवत पुराण और महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी। उस विजय के उपलक्ष्य में अगले दिन लोगों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया। इसीलिए नरकासुर के वध के दिन को नरक चौदस और अगले दिन को दीपोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

पृथ्वी को राक्षस विहीन कर, रावण के आतंक का अंत करके धर्म ध्वजा फहराने के बाद प्रभु श्रीराम, माता सीता, भैया लक्ष्मण और अन्य सहयोगियों के साथ जब अयोध्या लौटे तो अयोध्यावासियों ने हर्षोल्लास के साथ प्रभु का स्वागत करने के लिए नगर को दीपों से सजा दिया। हर घर और गली में उल्लास और खुशियों की लहर दौड़ गई। तब से दीपावली को लोग असत्य पर सत्य की जीत के उपलक्ष्य में मनाने लगे।

परन्तु एक सवाल फिर भी मन में रहता है कि अगर दीपावली की कहानी द्वापर और त्रेता युग से जुड़ी है तो इस दिन या तो प्रभु श्रीराम की या श्रीकृष्ण की पूजा होनी चाहिए पर हम लोग तो देवी लक्ष्मी और गणेश की पूजा करते हैं।

इसका जबाव हमारे ग्रंथों में मिलता है। एक दिन ऋषि दुर्वासा अपनी सममालापहनकर स्वर्ग की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्हें इंद्र दिखाई दिए। प्रसन्न होकर ऋषि ने माला इंद्र को भेंट स्वरूप दे दी। परंतु इंद्र मस्त होने के कारण माला अपने ऐरावत हाथी के सिर पर रख दी। हाथी ने सिर हिलाया और माला जमीन पर गिराकर पैरों से कुचल दी। यह देखकर ऋषि क्रोधित हो गए और इंद्र को श्राप दे दिया कि ऐश्वर्य अहंकार में तुमने मेरी भेंट का अपमान किया, जाओ तुम सब देव श्रीहीन हो जाओ। इस घटना से माता लक्ष्मी पाताल चली गईं। माता लक्ष्मी के प्रवास के बाद इंद्र, देवगुरु बृहस्पति और अन्य देवता ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने उन्हें लक्ष्मी को वापस लाने के लिए समुद्र मंथन की युक्ति सुझाई। समुद्र मंथन के दिन महालक्ष्मी निकलीं। उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या थी। महालक्ष्मी के प्रदुर्भाव के कारण ही दीपावली के दिन लक्ष्मी जी का पूजन किया जाता है। परन्तु बिना विवेक का धन रावण की तरह अहंकार और विनाश का कारण बनता है।

इसीलिए माता लक्ष्मी के साथ बुद्धि विवेक के देवता विघ्न विनाशक श्रीगणेश का पूजन किया जाता है। जीवन में केवल धन का होना पर्याप्त नहीं। धन के साथ बुद्धि भी होनी चाहिए ताकि वह समाज और परिवार की भलाई में काम आए। दीपावली पर जब हम लक्ष्मी गणेश का पूजन करते हैं तो दरअसल हम यह प्रार्थना करते हैं कि हमारे घर में धन भी आए और उस धन का उपयोग सद्कार्यों में करने की समझ भी बनी रहे।

भारत में दीपावली के अवसर पर दो बातें पूरे देश में सामान्य हैं। घर की साफ-सफाई और दीप प्रज्वलन। इस दीपावली, अपने मन और घर की सफाई करते हुए खूब दीप जलाइए और दूसरों के जीवन में भी प्रकाश फैलाइए।

आप सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

अनमोल दुबे 

लेखक, पत्रकार

About The Author

By Anmol Dubey

आधा लेखक, आधा पत्रकार

2 thoughts on “दीपावली: परंपरा, श्रद्धा और जीवन में प्रकाश की यात्रा”
  1. आपकी लेखन की कला बहुत ही स्पष्ट और मन को एक नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इस लेख के माध्यम से लोगों को दीपावली के महत्व के बारे में जानकारी मिलेगी। आप ऐसे लेख लिखते रहे।
    शुभ दिवाली 🪔

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