धर्म – हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा और उनकी सामग्री को लेकर कई ग्रंथों में अलग-अलग निर्देश मिलते हैं। कभी-कभी यही भिन्नता भ्रम का कारण बन जाती है कि कौन-सी सामग्री सही है और कौन-सी निषिद्ध। आचार्य अंशुल नायक इस विषय में स्पष्ट करते हैं कि शास्त्रों में मिलावट नहीं है, बल्कि काल, स्थान, उद्देश्य और स्वरूप के अनुसार पद्धतियों में भेद होता है। उदाहरणस्वरूप, गणेशजी के निमित्त तुलसी और दुर्गाजी के निमित्त दूर्वा का सामान्यतः निषेध है, फिर भी विशेष परिस्थिति या स्वरूपानुसार इसका विधान भी मिलता है। इस ज्ञान को समझने के लिए गुरुमुख से परंपरागत अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्नकर्ता: आचार्यजी ! शास्त्रों में वर्णन है कि देवी की पूजा दूर्वा से और गणेशजी की पूजा तुलसी से न करे किन्तु कहीं कहीं पद्धतियों में विधान भी मिल जाता है। ऐसे में भ्रम से बचने के लिए क्या करें ? क्या हमारे ग्रन्थों में मिलावट है ?

आचार्यश्रेष्ठ: सर्वप्रथम तो इस भ्रम से बाहर निकलें कि हमारे ग्रन्थों में मिलावट है। काल, भाव, अधिकार और उद्देश्य के भेद से पद्धतियों में भेद होता है। जैसे पेट्रोल, डीजल, हाइड्रोजन, विद्युत् आदि सभी ऊर्जा के ही योजक हैं किन्तु यन्त्रों में प्रणालीभेद है कि नहीं ? आलू, चना, धान, गेहूँ, बाजरा, दूध, दही आदि सब खाद्य पदार्थ ही हैं किन्तु पाकविधि और उपभोगविधि में भेद है कि नहीं ? ऐसा ही ग्रन्थों के विषय में समझना चाहिए।

सामान्यतः गणेशजी के निमित्त तुलसी तथा दुर्गाजी के निमित्त दूर्वा का निषेध वर्णित है एवं व्यवहार में भी ऐसा ही प्रयुक्त होता है किन्तु कुछ स्थिति या प्रकारभेद से इसमें विहित विधान भी है। श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, पद्मपुराण आदि अनेकों ग्रन्थों में ऐसा निषेधवाक्य मिलता है। पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में कहते हैं –

केतकीभवपुष्पैश्च नैवार्च्यः शङ्करस्तथा।

गणेशं तुलसीपत्रैर्दुर्गां नैव च दूर्वया॥

किन्तु नारद पुराण में जो गणेश जी का २१ नामावली से अर्चन है उसमें तुलसी का भी विधान है – शूर्पकर्णाय तुलसीम्। यदि भगवान् गणेश के शूर्पकर्णस्वरूप की पूजा करनी हो तो तुलसी से पूजन होगा। साथ ही, स्वरूपभेद के साथ कालभेद भी लागू है। यदि सप्तमी तिथि को पूजन करना है तो गणेशजी के निमित्त (किसी भी रूप में) तुलसी से अर्चन होगा।

गृहीत्वा तुलसीपत्रं भक्त्या विष्णुं समर्चयेत्।

अर्चितं तेन सकलं सदेवासुरमानुषम्॥

चतुर्द्दश्यां महेशानं पौर्णमास्यां पितामहम्।

येऽर्चयन्ति च सप्तम्यां तुलस्या च गणाधिपम्॥

(स्कन्दपुराण, प्रभासखण्ड, द्वारकामाहात्म्य, अध्याय – ४३, श्लोक – ०२-०३)

अब देवीजी की बात करते हैं। पद्धतियों में मन्त्र प्राप्त होता है –

दूर्वादले श्यामले त्वं महीरूपे हरिप्रिये।

दूर्वाभिराभिर्भवतीं पूजयामि सदाशिवे॥

कुछ विद्वान् कहते हैं कि कालिकोपासना में तो दूर्वा चढ़ जाएगी, समस्या नहीं किन्तु मुख्यतः दुर्गाजी के निमित्त तो सर्वथा निषेध है। मैं इस बात का वैशिष्ट्य प्रस्तुत करता हूँ। भगवान् आद्यशङ्कराचार्यजी ने चौंसठ उपचारों के वर्णन में दुर्गाजी के निमित्त दूर्वा का वर्णन किया है –

दूर्वया सरसिजान्वितविष्णुक्रान्तया च सहितं कुसुमाढ्यम्।

पद्मयुग्मसदृशे पदयुग्मे पाद्यमेतदुररीकुरु मातः॥

गन्धपुष्पयवसर्षपदूर्वासंयुतं तिलकुशाक्षतमिश्रम्।

हेमपात्रनिहितं सह रत्नैरर्घ्यमेतदुररीकुरु मात:॥

इसमें कुछ लोग कहते हैं कि पाद्य-अर्घ्य आदि में सुवासित करने हेतु दूर्वा का प्रयोग है, इससे अर्चन सिद्ध नहीं होता। ये तो मात्र जलसुवासन के निमित्त है।  नारदपुराण भी अर्घ्य विधान में समर्थन करता है –

विनायकस्य जननीमुपतिष्ठेत्ततोऽम्बिकाम्।

दूर्वासर्षपपुष्पाणां दत्वार्घ्यं पूर्णमञ्जलिम्॥

किन्तु ऐसा नहीं है, दूर्वा पूजन हेतु भी प्रयुक्त है। कुमारी पूजन में कहते हैं –

अष्टम्यां दूर्वया गौरीं पूजयामासुरेव च।

अष्टवर्षीयकन्यानां गौरीरूपेण पूजनम्॥

कुछ विद्वान् कहते हैं कि यद्यपि कुमारी का पूजन प्रत्यक्ष देवी के रूप में ही होता है फिर भी देहगत और विग्रहगत अर्चन में भेद तो होता ही है। विग्रहगत अर्चन में दूर्वा का दुर्गादेवी के निमित्त निषेध ही है। इसमें मैं यामलतन्त्र का समाधान प्रस्तुत करता हूँ –

विना वै दूर्वया देवीपूजा नास्ति च कर्हिचित्।

तस्माद्दूर्वा ग्रहीतव्या सर्वपुष्पमयी हि सा॥

अब इस तन्त्रवाक्य से तो दूर्वा का स्थान देवीपूजन में अनिवार्य हो गया, फिर दुर्गां नैव तु दूर्वया, इस पौराणिक वचन का क्या होगा ? इसमें स्वामिश्री ब्रह्मानन्द सरस्वती (कौलाचार्य) ने शाक्तानन्दतरङ्गिणी में यामल तन्त्र के ही वचन से समाधान किया है –

दूर्वा निषिद्धेति यदुक्तं तत् श्वेतदूर्वापरम् –

रक्तमाद्यं श्वेतदूर्वां नीलकण्ठं कुरुष्टकम्।

न दद्याच्च महादेव्यै यदीच्छेच्छुभमात्मनः॥

जिसके अग्रभाग में रक्तवर्ण हो, कण्ठ (जड़ के पास) नीला हो, जो पीलापन लिए अथवा दुर्गन्धयुक्त हो, ऐसी दूर्वा अथवा श्वेतवर्ण वाली दूर्वा को अपना कल्याण चाहने वाला व्यक्ति महादेवी को न चढ़ाए।

तात्पर्य यह है कि श्वेतदूर्वा न चढ़ाएं। हरितदूर्वा भी हो किन्तु दूषित-विकृत हो तो न चढ़ाएं। मात्र पुष्ट, स्वस्थ, कोमल हरित दूर्वाङ्कुर से देवीजी का पूजन करें। गणेशजी को सामान्यतः तुलसी नहीं चढ़ती किन्तु शूर्पकर्णस्वरूप की पूजा कर रहे हों अथवा सप्तमीतिथि को पूजन कर रहे हों तो तुलसी चढ़ा सकते हैं। शास्त्रों का रहस्य मात्र अपने से पढ़कर नहीं, अपितु गुरुमुख से परम्परया उसका ज्ञान लेकर ही समझ आता है अतः अपने बल पर शास्त्र को पढ़ना एवं अपने स्तर पर ही उसके मान्य या अमान्य होने का निर्णय दे देना घोर अनर्थकारी है।

शास्त्रों में दिखने वाला विरोधाभास वास्तविक विरोधाभास नहीं है। ग्रंथों में दी गई पद्धतियाँ काल, स्थान, उद्देश्य और देवता के स्वरूप के अनुसार भिन्न होती हैं। गणेशजी के लिए तुलसी और दुर्गाजी के लिए दूर्वा का सामान्यतः निषेध है, किन्तु विशेष अवसर, स्वरूप या तिथि के अनुसार इनका उपयोग भी विधिवत् संभव है। शास्त्रों का उद्देश्य अंधराग्रह या कठोर नियम नहीं, बल्कि भक्तिपूर्वक और विवेचित पूजन को सुनिश्चित करना है। इसके लिए केवल ग्रंथ पढ़ लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि गुरुमुख से परंपरागत अध्ययन और मार्गदर्शन आवश्यक है। यही कारण है कि प्रत्येक पूजन का विधान समझकर, स्वस्थ और उचित सामग्री का प्रयोग कर, श्रद्धा और भक्ति के साथ अर्चन करना सर्वोत्तम है। इस प्रकार, शास्त्रों की व्याख्या में विवेक और परंपरा का मेल ही सच्चा मार्गदर्शन देता है।

     लेखक 

आचार्य अंशुल नायक

9559425676

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