पुस्तक: हेरत हेरत हे सखी
लेखक: जगत नारायण पांडेय
प्रकशक: फ्लाइड्रीम्स पब्लिकेशन्स
मूल्य: 299
यह पुस्तक “हेरत हेरत हे सखी” मूलतः आध्यात्मिक चिंतन और जीवनानुभवों का अनूठा संकलन है। लेखक रत्नेश पांडेय ने इसे अपने बड़े पिताजी श्री जगत नारायण पांडेय की स्मृति और उनकी शिक्षाओं, छात्रो को लिखें गए पत्रों से प्रेरणा लेकर रचा है। यह मात्र एक ग्रंथ नहीं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय अध्यात्म और जीवन-दर्शन का जीवंत संवाद प्रतीत होता है।
लेखक जगत नारायण पांडे का जन्म 1 मई 1933 को देवरिया जिले के बरईपार पांडेय गाँव में हुआ। अध्ययन और अनुशासन के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें शिक्षा क्षेत्र में अग्रणी बनाया। स्नातक और बी.एड. की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन को जीवन का ध्येय बना लिया। मितगुणानन्द इंटर कॉलेज, बंजरिया के संस्थापक प्राचार्य के रूप में उन्होंने शिक्षा की मजबूत नींव रखी। साथ ही जनता इंटर कॉलेज, मजदूर हाई स्कूल और डी नोबिली स्कूल डिगवाडीह में भी प्राचार्य और हिंदी विभागाध्यक्ष रहे। विदेशों में भी उन्होंने हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। वे शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन नहीं बल्कि चरित्र निर्माण और समाजोत्थान का साधन मानते थे। सेवा-निवृत्ति के बाद भी गाँव में रहकर बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते रहे। कबीर, तुलसी, सूर और गीता के अध्येता पांडेय जी अनुशासनप्रिय, करुणामय और प्रेरणादायी शिक्षक थे। पुस्तक के पाठको के बीच आने से पूर्व ही 5 मार्च 2025 को उनका देहावसान हो गया।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा और शैली है। गूढ़ विषयों को जगत नारायण पांडेय जी ने सहज, प्रवाहपूर्ण और उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया है। अध्यात्म सामान्य पाठक के लिए अक्सर कठिन और जटिल माना जाता है, लेकिन यहाँ यह बोझिल नहीं होता। कहीं कबीर और ग़ालिब के सन्दर्भ मिलते हैं, तो कहीं गीता और उपनिषद की झलक दिखाई देती है। यही मिश्रण इसे रोचक और पठनीय बनाता है।
पुस्तक में ग्यारह अध्याय हैं जो जीवन के अलग-अलग आयामों पर प्रकाश डालते हैं। ‘अहं में से सोऽहम तक’, ‘हिंदी वर्णमाला और ब्रह्मांडीय चेतना’, ‘आधुनिक विज्ञान और आध्यात्मिकता’, ‘प्रतीक्षा, भक्ति और आत्मसमर्पण’ जैसे अध्याय पाठक को भीतर झांकने के लिए प्रेरित करते हैं। इन अध्यायों में यह स्पष्ट होता है कि लेखक ने केवल शास्त्रीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभव और चिंतन को भी पिरोया है। इससे पुस्तक न केवल बौद्धिक बल्कि आत्मिक स्तर पर भी जुड़ाव पैदा करती है।
पुस्तक की एक और खूबी इसकी सजीव स्मृतियाँ हैं। जो लेखक के जीवन और उनके शैक्षिक व सामाजिक योगदान को जिस आदर और आत्मीयता से चित्रित किया है, वह पाठक को भावुक कर देता है। एक आदर्श शिक्षक और मार्गदर्शक का व्यक्तित्व इसमें बार-बार उभरकर सामने आता है। यह स्मरण मात्र श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
इस पुस्तक में साहित्य, अध्यात्म और दर्शन का त्रिवेणी संगम है। लेखन में भावुकता है पर अतिशयोक्ति नहीं। विवेक और तर्क का संतुलन है, पर सूखा बौद्धिकपन नहीं। कहीं यह काव्यात्मक हो उठता है, तो कहीं अत्यंत व्यावहारिक और धरातलीय। यही लय इसे विशिष्ट बनाती है।
कुछ स्थानों पर गहन दार्शनिक विवेचन सामान्य पाठक को थोड़ी चुनौती दे सकता है, लेकिन लेखक ने उदाहरणों और सरल भाषा के कारण उसे समझने योग्य बना दिया है। यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्मसंवाद के लिए भी है।
“हेरत हेरत हे सखी” एक ऐसी कृति है जो पाठक को सोचने, ठहरने और भीतर झांकने के लिए विवश करती है। यह गुरु-परंपरा की गरिमा, अध्यात्म की गहराई और साहित्य की सुंदरता को एक साथ समेटे हुए है। यह पुस्तक उन सभी के लिए उपयोगी है जो जीवन के अर्थ को गहराई से समझना चाहते हैं और आत्मा की खोज में ईमानदार प्रयास करना चाहते हैं।
अनमोल दुबे
