ओरछा के इतिहास की शुरुआत 15वीं शताब्दी से हुई, इसकी स्थापना का रूद्र प्रताप सिंह जू बुन्देला ने की थी. वही अगर बात ओरछा राम राजा मंदिर की करे तो इसकी स्थपना बढ़ी ही रोचक हैं  इस मूर्ति को मधुकर शाह बुन्देला के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी गनेश कुंवर अयोध्या से लाई थीं। रानी पुख्य नक्षत्र में अयोध्या से पैदल चलकर के ओरछा तक भगवान राम के बाल स्वरूप को ओरछा लाईं थी जब महारानी गणेश कुँवर अयोध्या पहुँची तो उन्हें राम जी कही न मिले जिससे निराश हो कर उन्होंने निश्चय किया कि बिना भगवान राम को लिए वो ओरछा वापिस लौट कर नही जाएगी वो सरयू जी में ही जल समाधी ले लेगी तभी राम जी ने बालक रूप में आ कर के महारानी गणेश कुँवर से ओरछा चलने की कुछ  शर्त  रखी उन्होंने कहा कि रानी केवल पुख्य नक्षत्र में ही चलेगी औऱ वो जहाँ मूर्ति को रख देगी मूर्ति वहां से उठेगी नही  पर जब वो ओरछा आयी तब रात हो गई थी औऱ वो खुशी में भूल गई कि मूर्ति कही रखनी नही हैं , उन्होंने भगवान राम को कुछ समय के लिए  के भोजन कक्ष में स्थापित किया गया कि जब मंदिर पूरा हो जायेगा तो धूमधाम से मूर्ति की स्थापना चतुर्भुज मंदिर में करेगी, लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। औऱ इसे ही  ईश्वर की इच्छा मानते हुए रसोई को ही मंदिर का रूप दे दिया गया.

रामजी को ओरछा का राजा माना जाता हैं। कोई भी मंदिर के अंदर चमड़े से बनी वस्तुओं को नही ले जा सकता चमड़े की वस्तुओँ का मंदिर में  प्रवेश निषिद्ध हैं। राम जी को रोज  यहाँ गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता हैं  और रात मे आरती के बाद कुछ दूर तक लालटेन ले कर के पुजारी व भक्तगण उन्हें अयोध्या के लिय छोड़ने जाते हैं, निवेदन करते हैं कि अगले दिन सुबह से वो जल्दी आ जावें

चतुर्भुज मंदिर
उत्तर भारत के टीकमगढ़ जिला में स्थित ओरछा (हाल ही में यहां एक नया जिला बनाया गया जो निवाडी के नाम से विख्यात है, जिसके कारण ओरछा अब इसी जिले के अन्तर्गत आने लगा है) ओरछा के बारे में शायद ही ऐसा कोई होगा जो नहीं जानता होगा। विश्व विख्यात ओरछा हमेशा से ही बहुत चर्चित रहा है और उसकी बजह है कि ओरछा का स्वर्णिम इतिहास, बुंदेला राजाओं द्वारा बसाया गया। येे नगर बेहद खास है इस स्थान के खास होने की बजह है यहांं का राम मंदिर और  ऊंची- ऊँची इमारतें सबके मन को मोह लेने वाली छतरियां और किले, यहांं जितनेे भी स्थान व इमारतें हैं सभी से जडी़ कोई न कोई कहानी जरुर है, जो बेहद अनूठी है।

हम बात कर रहे हैं इन में से एक चतुर्भुज मंदिर की…

1.चतुर्भुज मंदिर का इतिहास-

चतुर्भुज मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित, भारत के मध्य प्रदेश में ओरछा में स्थित है।  चतुर्भुज नाम ‘चतुर’ का अर्थ है “चार” और ‘भुज’ का अर्थ है ” भुजाएं” जिसका शाब्दिक अर्थ है “जिनकी चार भुजाएं हैं” और राम को विष्णु के अवतार के रूप में संदर्भित करता है।  मंदिर में एक जटिल बहु-मंजिला संरचनात्मक दृश्य है जो मंदिर, किले और महल की स्थापत्य कलाओं का मिश्रण है।

मंदिर का निर्माण मधुकर शाह द्वारा शुरू किया गया था और उनके बेटे, वीर सिंह देव द्वारा 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में पूरा किया गया।

मधुकर शाह जी ने इस मंदिर का निर्माण अपनी रानी कुँवरी गणेशी के कहने पर प्रभु श्री राम के लिए करवाया था, लेकिन प्रभु श्री राम ने इस महल को स्वीकार नहीं किया था।

चतुर्भुज मंदिर एक मात्र ऐसा देवालय है जिसमें एक साथ तीन निर्माण शैलियों  मंदिर, राजमहल, और दुर्ग का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार की शैली सेे निर्माण भारत में पहली और आखिरी बार ही किया गया। भगवान श्री राम तो इस मंदिर में बिराजमान नहीं हुुुए लकिन मंदिर सूना न रहे इसलिए इस मंदिर में राधे कृष्ण बिराजमान कर दिये गये।

2. मंदिर के बीचों बीच चोटी पर स्थित सोने का कलश और जलेवी

चतुर्भुज मंदिर से जुड़ी ये जानकारी शायद ही आप लोगों को पता होगी जी हां इस मंदिर की चोटी पर बीचों बीच लोहे के मोटेे तार पर सोने का कलश और जलेवी स्थित थे। जहाँ एक ओर ओरछा अपने स्वर्णिम इतिहास और कहे अन कहे  किस्सों के लिए प्रचलित है, वही  दूसरी ओर चतुर्भुज मंदिर का ये किस्सा कम चौकाने वाला नहीं है। हमें इस बारे में जानकारी कम थी इसलिए हम ओरछा के संगीतकार रजनीश दुुबे  जी के पास गये, दुबे जी नेे बताया की चतुर्भुज मंदिर पर सोने का कलश सवा मन यानी 50 कि़लो और जलेवी स्थित थे। येे कलश और जलेवी राजा ने  शायद इसलिए लगवाये हो क्योंकि इस मंदिर में श्री राम जी को बिराजमान होना था। जिससे ये मंदिर की शोभा बड़ा सके।

3. जब कलश चोरी हुआ

आप सभी कल्पना कीजिए की अपनेे समय में चतुर्भुज मंदिर सोने का कलश और जलेवी से युक्त कितना सुंदर और मनमोहन रहा होगा, लेकिन सदा से ही हमारे भारत में ऐसे मूर्ख और लालची इंसान रहे हैं जो अपनेे निजी स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कितने ही गिर सकते हैं। बात है लगभग 1972-73 की तब ओरछा विश्व स्तर पर इतना प्रचलित नहीं था, और ओरछा में कोई बिशेष गौर दौर नहीं किया जाता था, तभी कुछ लोगों की नियत खराब हुुई, और रातों-रात वायुयान की मदद से ये कलश कटवा लिया जाता है। येे घटना बहुत ही शर्मसार कर देने वाली है। खैर शक के दायरे में कई लोग रहे लेकिन स्पष्टीकरण नहीं हो पाया।

4. कलश के बाद जलेवी हुई चोरी-

कलश चोरी होने के बाद मंंदिर पर अब सिर्फ जलेवी बची थी, निचाई सेे देखने पर जलेवी सोने की प्रतीत होती थी। बुरी नियत रखनेे वाले हमेशा बुरा ही सोचते हैं, कलश चोरी होने के पश्चचात लगभग 29-30 साल बाद सितम्बर 2002 में फिर किसी के मन में खोट आया और रातों-रात एक बार  फिर जलेेवी चोरी कर ली गई। इस बार  स्थानीय लोगों में आक्रोश ज्यादा था, क्योकि कलश की घटना अभी भूले नहीं और जलेवी भी चोरी हो गयी, लोगों  ने प्रशासन से अनुरोध किया की जल्द से जल्द अपराधियों को पकड़ा जाए, पुलिस ने जांच शुरु कर दी जिससे अपराधी सतर्क हो गये, पटैरिया जी नेे बताया की चोरों ने जलेवी के टुकड़े करके कई सोनारों के पास इसकी पहचान कराने के लिए गये, परन्तु जिस भी सोनार केे पास गये सभी ने यह कहकर मना कर दिया कि यह सोना नहीं है लेकिन है कोई कीमती धातु, यहां  एक ओर प्रशासन अपनी जांंच कर ही रहा था, चोरो नेे पुलिस के डर से ओरछा में किसी एकांंत स्थान पर एक कपड़े में बांंधकर टूटी हुई जलेवी छोड़ गये जैसे ही पुलिस को पता लगा तुरंत वहां पहुँच और जलेवी को जांंच के लिए शायद पुणे भेज दिया गया, वहां की लेव से पता चला कि जलेवी प्लैटिनम धातु की है, जो सोने से भी कीमतीं होती है, जिसे सफ़ेद सोना (white gold) कहा जाता है। जलेवी आज भी राजकीय कोष में शामिल है।

ओरछा तक पहुँचने के लिए आप तीनो माध्यमों मेज़ किसी का भी उपयोग कर सकते हैं ।
वायु मार्ग ओरछा का नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो , ग्वालियर हैं  खजुराहो 163 किलोमीटर की दूरी पर , ग्वालियर  105 किलोमीटर की दूरी पर हैं  जो नियमित फ्लाइटों से जुड़ा हैं ।
रेल मार्ग ओरछा तक  रेलवे लाइन हैं जहां  ट्रेन से पहुंचा जा सकता हैं। इसके अलावा ओरछा का नजदीक झाँसी जंक्शन हैं 
सड़क मार्ग ओरछा झांसी-खजुराहो मार्ग पर स्थित हैं। बस, टैक्सी ओरछा और झांसी को जोड़ती हैं।

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